Saturday, 6 April 2013

पुरानी सब्जीमंडी




2 अप्रैल
11:34am
फैजाबाद

कल मै अपने पुराने शहर की पुरानी सब्जी मंडी गया था.
पुराना इसलिए क्यूकी मेरा बचपन बीता था यहाँ. इन्ही गलियों के दरमियाँ हमने चलना सीखा था.
इन्ही सब्जी वालों के बीच हर शाम मैं और पिताजी सब्जी लेने आते थे.
उस दौर कभी गौर नहीं किया, और कुछ ज़रूरत भी महसूस नहीं हुई. आज इत्मिनान से कुछ लम्हे बस देखता ही रहा, लोगों को - चीज़ों को. सब्जीवालों को, खोमचे वालों को, ज़मीन पर बैठे उस निराश से दिखते, कुछ गंजे से हो चुके सब्जी वाले को. जिसने सारे आलू जमीन पर बिखेर रखे थे, इस बात से बेफिक्र की कोई उठा ले जायेगा.
कुछ आगे बढ़ा तो साग वाला, जो हर कुछ लम्हे पानी दाल कर पत्तियों को हरा रखने की कोशिश कर रहा थे. और आगे एक बूढी औरत बस दो या तीन कद्दू रखे अपने खरीदार के इंतज़ार में बैठी थी. 
यहाँ मसालों का भी व्यापर हो रहा था . किसी ने दो रुपये देकर कहा सब मसाले दे दो, और बूढ़े काका ने झट से एक अखबार की टुकड़े में मसालों की तमाम किस्में कैद कर दीं.
उस दिहाड़ी मजदूर को कैसी विजय अनुभूति हुई होगी, की उसने आज शाम का कैसा कामयाब कारोबार जमा लिया.
एक कोने में कुछ दूर सही ऎक औरत कुछ मछलियाँ भी बेच रही थी. यहाँ सबसे ज्यादा भीड़ थी, खरीदने वालों से ज्यादा देखने वालों की. मुझे लगा गरीबों ने आँखों से ही स्वाद चखने की अद्भुत कला विकसित कर ली है.
लेकिन मै ये क्या कहने लगा, अरे मै कोई सब्जी मंडी का अवलोकन थोड़े ही कर रहा था. मैने तो बस इतना ही गौर किया की यह सारे चेहरे मेरे बचपन वाले ही थे.
हर ठेला, हर खोमचे वाला, वो मछली वाली की खचिया, उस साग वाले की बोरी. यह सब वही लोग थे जो मेरे बचपन के सहयात्री थे. यह सब बंदोबस्त मेरे उस भूल चुके और छूट चुके बचपन का हिस्सा ही तो थे.
लेकिन एक फर्क आ गया था.
मैंने ज़िन्दगी की दौड़ में अपना शहर, और इस पुरानी सब्जीमंडी के लोगों को बहुत पीछे छोड़ दिया था. कुछ बड़ा और बेहतर हासिल करने की ख्वाहिश में ये सारे चेहरे मुझसे बहुत दूर हो गए थे.
और आज जब गौर किया तो इन चेहरों में बहुत झुर्रियां पड़ गयीं थीं. इनके सपने इनके सोच सब इस सब्जी मंडी से ही जुडी रहीं. यहाँ कोई बदलाव नहीं आया.
लोग भी वही थे, सब्जियां भी वही थी और दाम भी कमोबेश वही थे.
बस मै इस ज़िन्दगी की दौड़ में दौड़ते हुए कहीं इन सब से बहुत पीछे छूट गया था.

Monday, 8 October 2012

प्रेममय !



बात ये नजदीक की है
दस बरस भी ठीक से बीते ना होंगे
मै युवा होने चला था
तुम किशोरी भी कहीं से तनिक ना थी

प्रेम की भाषा का वर्णन क्या करूँ मैं
ठीक से मैंने अभी बोली नहीं थी
और तुमने भी जुबां खोली कहीं थी?
पर हाय यह प्रेम
यह ह्रदय जो प्रेम से अतिरेक हो
उन्माद में और भावना में अभिव्यक्त था
अब भला भाषा की किसको क्या ज़रूरत
मै था तुम थी और जहाँ था
फिर उमर भोली नहीं थी.

हर जगह मेरा ही चेहरा था उसे जो दीख पड़ता
हर रंग था चादर लपेटे, जो की मेरे रंग सा था
हर शब्द में और भावना में
हर वाक्य में और कल्पना में
मैं ही मै था सब समाहित
और सब मुझसे प्रभावित
और अपना हाल भी मै क्या बताऊँ
खेली बस होली नहीं थी.

मेरा चिंतन मेरी काया
कुछ अधिक भी उस अबल से भिन्न ना थी
दिन विरत था मिलन की परिकल्पना में
और संध्य में जो थी कभी साकार होती.
मै जग उदित प्रतिपल मुदित
मंथ सागर का समेटे जी रहा था.
और कभी जब भोर की और सान्झ दूरी बढ़ी थी
मृग नयन की वह विरलता और सकल जग की विकलता
तुम विकल थी मै सकल था.
किन्तु हम दोनों निबल थे.

पर ह्रदय के अंतस में हमने जो कहीं था बाँध रखा
क्या कभी उसने कही थी या कभी उसने सुनी थी
ना कभी वो शब्द आये ना कभी स्पर्श जाने
प्रश्न थे सम्पूर्ण थे किन्तु उत्तर कौन माने
व्यर्थ के सामर्थ्य के कुछ बन्धनों में तुम पड़ी थी
पुरुषार्थ की परिवार की सीमा के अंदर मै खड़ा था

और आज जब बरसों का सावन जा चूका है
और जब हमारा क्लांत यौवन चुका है
तुम वहां अपने प्रिये के चिर-सघर को गढ़ रही हो
मै यहाँ प्रियतम की अपने शांत बातें पढ़ रहा हूँ

और आज तुमको क्या बताऊँ (हे प्रियतम)
वेदना में यातना में चित्त में और कल्पना में
पंक मय सकलंक मय
अग्नि से उद्विग्न होकर डंक मय
राह तेरी देखता हूँ.
नयन धूमिल ही सही और आस धीमी ही सही
पर छांह तेरी देखता हूँ.
और प्रेम में निर्भीक हो
कुछ स्वर कहीं से कह रहे हैं ;
" बात ये नजदीक की है
दस बरस भी ठीक से बीते ना होंगे
मै युवा होने चला था
तुम किशोरी भी कहीं से तनिक ना थी "

Wednesday, 15 August 2012

मेरी आजादी !


मुझे आजाद करो
इस तंग होती सोच से
इस रोज़ होती जंग से
खुद से लडती थक चुकी, आत्मा से
मुझे आजाद करो.

क्या जश्न करूँ, क्या मान धरुं
क्या आजादी का फरमान करूँ
जब स्वयं कहीं है बंधा पड़ा ; जब सोच यहीं है बंधी हुई
तुम भगत सही या गाँधी हो
इस कैद का तुम संधान करो
मुझे आज़ाद करो.

Wednesday, 8 August 2012

अशांत मन....... कुछ यूँ ही !


जो गुज़र चुकी जो बीत ग
यीं उन बातों को उन राहों पर अब रात बिताना ठीक नहीं.
जो पंथी था अब साथ नहीं उन बातों पर अब राख चिताना ठीक नहीं.
मेरे अंतर का विचलित मन, अनमन उद्द्वेलित जीवन
इन सब से कह दो शांत धरें अब बात बढ़ाना ठीक नहीं.

इक आज अकेलेपन ने यूँ मन को घेरा जीवन ढेरा
जब सोच कही है शून्य पड़ी क्या जानू मै तेरा मेरा
एकाकीपन का सार सही तुम साथ नहीं कुछ हाथ नहीं
वैरागी हूँ क्या व्यक्त करूँ अब हाथ बढ़ाना ठीक नहीं
जो गुज़र चुकी जो बीत गयीं उन बातों को उन राहों पर अब रात बिताना ठीक नहीं.

कुछ रुका हुआ कुछ ठहरा सा अनजाना सा मन आज हुआ.
बहता जल जैसे ठहरा हो नीरवता का आभास हुआ
फिर आज अचानक सिहरन ने अपनी चादर सी फैलाई
फिर विवश पड़ा आकुल अंतर फिर साँझ ने ली एक अंगडाई
मन रे तू संयम रख, इस अग्नि ह्रदय की पीड़ा पर
जीवन के पिछले पृष्ठों पर अब लेख चलाना ठीक नहीं.
जो गुज़र चुकी जो बीत गयीं उन बातों को उन राहों पर अब रात बिताना ठीक नहीं.
                                                                                  (.....अभी शेष है )